उत्तर प्रदेश उद्योग विभाग की जानकारी: सिर्फ़ ₹5 लाख में बिज़नेस कैसे शुरू करें.

यूपी के इंडस्ट्री एडिशनल कमिश्नर के साथ एक विस्तृत इंटरव्यू, जिसमें MSME स्कीम, नएउद्यमियों के लिए बिना ब्याज वाले लोन, इंडस्ट्रियल ज़मीन की उपलब्धता, एक्सपोर्ट बढ़ाने की रणनीति और बिज़नेस में फेल होने से बचने के लिए व्यावहारिक सलाह पर चर्चा की गई है।

नमस्कार! एमएसएमई बदलाव के एक नए एपिसोड में आपका स्वागत है। आज हमारे साथ मौजूद हैं उत्तर प्रदेश के इंडस्ट्री एडिशनल कमिश्नर उमेश कुमार सिंह जी, जो हमें बताएंगे कि एमएसएमई सेक्टर के लिए सरकार की कौन-कौन सी योजनाएं चल रही हैं, कहां-कहां सुधार की जरूरत है और नए उद्यमियों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

Table of Contents

उत्तर प्रदेश सरकार की प्रमुख योजनाएं

माननीय मुख्यमंत्री जी के नेतृत्व में बनी इस सरकार में उद्योग विभाग और एमएसएमई को प्राथमिकता के तौर पर पहले-दूसरे नंबर पर रखा गया है। एमएसएमई में सर्विस इंडस्ट्री, मैन्युफैक्चरिंग, गांव के परंपरागत काम और एक्सपोर्ट आइटम — सब कुछ शामिल है। प्रमुख योजनाओं में शामिल हैं:

  • ओडीओपी (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट)
  • विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना (वीएसएसवाई)
  • मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना
  • मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान
  • एक्सपोर्ट से जुड़े उद्यमियों के लिए आधे दर्जन से ज्यादा योजनाएं

ओडीओपी: एक क्रांतिकारी सोच जो अब देशभर में अपनाई जा रही है

2018 में लॉन्च हुई वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) योजना पीछे मुख्य सोच यह थी कि हर जिले की अपनी एक खास पहचान होती है — जैसे मुरादाबाद का पीतल, मेरठ के स्पोर्ट्स गुड्स, बनारस की साड़ी और कारपेट, भदोही की कालीन। इस स्कीम के तहत ट्रेनिंग, वित्त पोषण, टूलकिट्स और मार्केट एक्सेस उपलब्ध कराया गया, जिससे न सिर्फ पहले से काम कर रहे कारीगर संरक्षित हुए बल्कि नए लोगों को रोजगार के मौके भी मिले। आज दूसरे राज्य और विभाग भी इस मॉडल को अपना रहे हैं।

उद्योग के लिए जमीन कैसे मिलेगी?

जमीन की उपलब्धता के लिए उद्योग विभाग, यूपीसीडा (UPSIDA) और नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना अथॉरिटी जैसी इंडस्ट्रियल अथॉरिटीज के पास प्लॉट्स और शेड्स उपलब्ध हैं, जिन्हें ई-ऑक्शन के जरिए बिना किसी ह्यूमन इंटरफेस के आसानी से पाया जा सकता है। इसके अलावा प्लेज पार्क जैसी योजना के तहत निजी प्रमोटर्स को सिर्फ 1% ब्याज दर पर वित्तीय सहायता दी जाती है ताकि वे जमीन खरीदकर प्लॉटिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप कर सकें। वर्तमान में पूरे उत्तर प्रदेश में 14 प्लेज पार्क विकसित हो रहे हैं।

आवेदन कैसे करें?

हर जिले में जिला उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन केंद्र स्थापित है, जहां डिप्टी कमिश्नर इंडस्ट्री की टीम में “उद्यमी मित्र” होते हैं जो जमीन की उपलब्धता से लेकर विभिन्न विभागों से जरूरी एनओसी और कंसेंट दिलाने तक पूरी मदद करते हैं। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में होने वाली बैठकों के जरिए भी बाधाएं दूर की जाती हैं।

लोन या जमीन के लिए आवेदन से पहले क्या तैयार रखें?

आवेदन के लिए सबसे जरूरी है एक ठोस डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर), जिसमें साफ हो कि:

  • वित्त की व्यवस्था कहां से होगी
  • प्रोडक्ट क्या होगा और रॉ मटेरियल कहां से आएगा
  • कितना निवेश किया जा रहा है
  • मार्केट कहां और कैसे पकड़ी जाएगी

प्लॉट साइज या निवेश की कोई न्यूनतम/अधिकतम सीमा नहीं है — यह पूरी तरह उद्योग की जरूरत पर निर्भर करता है।

लोन आसानी से कैसे मिले — रिजेक्शन से कैसे बचें

बैंकों का सीडी रेशियो (क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो) पहले करीब 35% था, जो अब बढ़कर 65-70% हो गया है — यानी लोन मिलना पहले से कहीं आसान हो गया है। लेकिन इसके लिए बेसिक तैयारी जरूरी है:

  • रॉ मटेरियल का स्रोत क्या होगा
  • मैनपावर कहां से मिलेगी
  • मशीनें कहां से आएंगी
  • फिनिश्ड गुड्स किस बाजार में बेचे जाएंगे
  • प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले कॉस्ट कैसी रहेगी

इन सवालों के जवाब तैयार हों तो कोई भी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन बिना ठोस कारण के आवेदन रिजेक्ट नहीं कर सकता। हर जिले के उद्योग विभाग कार्यालय में जाकर इस बारे में जानकारी ली जा सकती है।

उत्तर प्रदेश की औद्योगिक प्रगति — कहां सुधार की जरूरत है

उत्तर प्रदेश अभी महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बाद देश की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। हर बार सुधार के साथ नई चुनौतियां भी सामने आती हैं, इसलिए सुधार की प्रक्रिया एक सतत प्रयास है। यूपीआईटीएस (25-29 सितंबर को होने वाला चौथा संस्करण) जैसे ग्लोबल समिट के जरिए राज्य अपनी पहुंच और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी बढ़ा रहा है। लक्ष्य है कि सभी विभागीय कंसेंट और एनओसी प्रक्रियाएं और ज्यादा ऑनलाइन, तेज और सरल बनाई जाएं।

किन सेक्टरों में सबसे ज्यादा संभावनाएं हैं?

कोविड के दौरान जब बाकी सब बंद था, तब भी फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री खुली रही — इसीलिए फूड प्रोसेसिंग और पैकेजिंग को सबसे संभावनाशील सेक्टर माना जा रहा है। इसके अलावा:

  • मेडिकल सेक्टर — एक बड़ा हब बनने की क्षमता
  • हॉस्पिटैलिटी, होटल्स, टूरिज्म और ट्रैवल इंडस्ट्री — बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर (हाईवे, एयरपोर्ट) के साथ तेजी से बढ़ता क्षेत्र
  • आईटी सेक्टर — रोज नए अवसर बनने वाला क्षेत्र

टूरिज्म विभाग की भी लॉज, होटल और छोटे गेस्ट हाउस बनाने के लिए अच्छी योजनाएं उपलब्ध हैं।

क्या उद्योग सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित है?

यह धारणा अब पूरी तरह सही नहीं रही। किसी भी उद्योग के विकास के लिए दो चीजें बुनियादी हैं — कानून-व्यवस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर (सड़क और बिजली)। अब यह सुविधाएं पूर्वांचल और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में भी पहुंच चुकी हैं। उदाहरण के तौर पर, बनारस के पास स्थित छोटे से जिले चंदौली में अब करीब 200 बड़ी यूनिटें स्थापित हो चुकी हैं, और हरियाणा से आकर भी लोग यहां उद्योग लगा रहे हैं — क्योंकि यहां से बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ तक माल कम ट्रांसपोर्ट चार्ज पर पहुंचाया जा सकता है। ऐसी जगहों पर उद्योग लगाने वालों को अतिरिक्त इंसेंटिव भी दिए जाते हैं।

परंपरागत उद्योगों को एक्सपोर्ट से कैसे जोड़ा जा रहा है?

उत्तर प्रदेश का निर्यात 2017 में करीब ₹80,000 करोड़ था, जो आज ₹2 लाख करोड़ से ऊपर पहुंच चुका है। ओडीओपी योजना के तहत परंपरागत कारीगरों को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, निःशुल्क टूलकिट, और यूपीआईटीएस व दिल्ली में लगने वाले फेयर जैसे मार्केट प्लेटफॉर्म दिए जाते हैं। निर्यात प्रोत्साहन ब्यूरो के जरिए विदेशी फेयर में स्टॉल लगाने, सैंपल और माल भेजने पर सब्सिडी भी दी जाती है।

चीन जैसे आयातित उत्पादों से मुकाबला कैसे हो?

चीन के उत्पाद और भारतीय/उत्तर प्रदेश के उत्पादों की क्वालिटी में कोई तुलना नहीं है — चीन के उत्पाद ज्यादातर “यूज़ एंड थ्रो” श्रेणी के होते हैं और लंबे समय तक टिकते नहीं। हालांकि लागत के मोर्चे पर यह जरूर एक चुनौती है, जिसे विभागीय योजनाओं के जरिए कॉस्ट-कटिंग और प्रतिस्पर्धी मूल्य बनाकर हल करने की कोशिश की जा रही है — क्वालिटी से समझौता किए बिना।

नया उद्योग शुरू करने के लिए कितनी पूंजी चाहिए?

फर्स्ट-जनरेशन उद्यमियों के लिए पूंजी सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसके लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं:

  • सीएम युवा विकास अभियान: ₹5 लाख तक का लोन, जीरो ब्याज दर पर। 4 साल में लोन चुकाने पर ₹1 लाख की मार्जिन मनी सब्सिडी भी मिलती है — यानी असल में सिर्फ ₹4 लाख ही चुकाना होता है।
  • ओडीओपी और मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना: ₹25 लाख तक, जिसमें 25% तक की कैपिटल सब्सिडी मिलती है।
  • एमएसएमई पॉलिसी 2022: सीधे इंडस्ट्री लगाने वालों के लिए कैपिटल सब्सिडी और जमीन खरीद पर स्टाम्प ड्यूटी में छूट।

काम ₹5 लाख से भी शुरू किया जा सकता है और ₹5 करोड़ तक भी जा सकता है — यह पूरी तरह उद्यमी की अपनी क्षमता पर निर्भर करता है। सलाह यही है: छोटे से शुरुआत करें, सफलता और अनुभव के साथ धीरे-धीरे निवेश बढ़ाएं।

सफल और असफल उद्यमियों में क्या फर्क होता है?

एक बड़ा फर्क गैर-जरूरी (नॉन-प्रोडक्टिव) खर्चों में दिखता है। जैसे ही टर्नओवर ₹1 करोड़ होता है, कुछ लोग तुरंत ₹50 लाख की गाड़ी खरीद लेते हैं, जबकि समझदार उद्यमी ₹10 लाख की गाड़ी लेकर बाकी पैसा दोबारा बिज़नेस में लगाते हैं। ज़रूरत से ज्यादा शानदार ऑफिस, महंगी चेयर, एसी जैसे खर्च शुरुआत में ही गलत दिशा तय कर देते हैं।

इसके अलावा जरूरी है:

  • रोज बदलती टेक्नोलॉजी और कस्टमर डिमांड के अनुसार खुद को ढालना
  • रॉ मटेरियल से फिनिश्ड गुड्स तक पूरी प्रक्रिया पर नियमित नजर रखना
  • कहीं भी वेस्टेज या नुकसान हो रहा हो तो उसे पहचानना — इसे लीन मैन्युफैक्चरिंग कहा जाता है (जैसे जरूरत से ज्यादा वॉट का बल्ब, जरूरत से ज्यादा स्टाफ रखना, पुरानी मशीन को बार-बार मरम्मत कराते रहना बनाम नई मशीन में निवेश करना)

मार्केट तक पहुंच बनाने की रणनीति

मैन्युफैक्चरिंग यूनिट शुरू करने से पहले कम से कम एक महीने का बाजार सर्वे जरूरी है:

  • आसपास कितने बाजार हैं और अपनी उत्पादन क्षमता के अनुसार कितनी जगहों तक पहुंचना संभव है
  • मौजूदा सप्लायर किस रेट पर सामान दे रहे हैं और कैसे पहुंचा रहे हैं
  • अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी और कीमत प्रतिस्पर्धियों से बेहतर या बराबर रखना (कीमत ज्यादा नहीं होनी चाहिए, भले ही 10 पैसे कम हो)

फर्स्ट-जनरेशन उद्यमियों के लिए सुझाव है कि बड़े प्रतिद्वंदियों से सीधे टकराने की बजाय छोटे शहर, कस्बे और गांव के रिटेलर पकड़ें, और शुरुआत में उन्हें भुगतान के लिए थोड़ी छूट (जैसे 15 दिन का समय) देकर भरोसा बनाएं।

शुरुआती नुकसान से घबराएं नहीं

नए खिलाड़ी के तौर पर शुरुआती झटके स्वाभाविक हैं — यह अनुभव सिखाता है कि किस पर भरोसा करें और कैसे काम करें। कई आज के बड़े उद्यमी भी दशकों पहले प्रधानमंत्री रोजगार योजना जैसी स्कीम से मामूली ₹75,000 के लोन से शुरुआत करके आज हजारों लोगों को रोजगार दे रहे हैं। जरूरी है रोज खुद का आकलन करना — कमी कहां है, बाजार में क्या बदल रहा है — और सबसे जरूरी, जिस काम को करें उसमें वास्तविक रुचि हो।

लोन डिफॉल्ट होने पर क्या राहत मिलती है?

आज सरकार सीधे लोन नहीं देती — सभी लोन बैंकों के माध्यम से मिलते हैं, सरकार सब्सिडी, ब्याज-मुक्ति, कैपिटल सहायता और सीजीटीएसएमई गारंटी के रूप में सहयोग देती है। बैंक खुद अध्ययन करते हैं कि डिफॉल्ट जानबूझकर हुआ है या वास्तविक कारणों (जैसे कोविड के दौरान) से — ऐसे मामलों में वन टाइम सेटलमेंट (OTS) स्कीम या नया लोन देकर सहयोग किया जाता है, बशर्ते उद्यमी के पास एसेट और मशीनरी मौजूद हो और असफलता का कारण वाजिब हो।

नए उद्यमियों के लिए अंतिम सलाह

न तो सरकारी क्षेत्र में और न ही प्राइवेट सेक्टर में इतनी नौकरियां हैं कि सबको रोजगार मिल सके — इसलिए स्वरोजगार ही एकमात्र रास्ता है जो सबको रोजगार दे सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी है स्किल्ड होना। एक कुशल बिजली मिस्त्री या प्लंबर तक की मांग इतनी है कि उसे कई बार फोन करने पर भी समय मुश्किल से मिलता है — यानी अगर व्यक्ति के पास हुनर है, तो देश में बेरोजगारी का कोई सवाल ही नहीं उठता।


अगर आपके कोई सवाल या सुझाव हैं तो jagran@business.com पर मेल कर सकते हैं।

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