
आज की इस article में हम आपको एक ऐसी मशीन दिखाएंगे जिसमें आप चाहे अपनी पराली है जिसको हम बिल्कुल वेस्ट समझते हैं। चाहे अपने सरसों का भूसा हो चाहे मुर्गियों की पीठ हो यानी कोई भी मटेरियल हो एग्रीकल्चर वेस्ट हो उसको हम बायो कोइयल में बदल सकते हैं।
यह कारनामा किया है पटियाला के बहुत ही फेमस हमारे युवा इंजीनियर कार्तिक पाल ने। आज हम आपको उनसे मिलवाते हैं और उनकी मशीन भी दिखाते हैं। आखिर इस मशीन की खास बात क्या है जिसकी डिमांड भयंकर हो रही है? और यह बायोफ्यूल है जिसको आप हल्के में मत लीजिएगा, क्योंकि इसकी डिमांड आज सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में है। तो आइए दोस्तों, शुरू करते हैं।
2019 में पहले सर गोबर से लकड़ी बनाने का काम करते थे। अब बायो कोयला बना रहे हैं |
सवाल: सर, सबसे पहले अपना परिचय दें। वैसे तो आपको सभी लोग जानते ही हैं, पर नए लोगों के लिए एक बार अपनी बैकग्राउंड डिटेल दीजिए और फिर हम आपसे जानेंगे इस बायो कोयल के बारे में।
जवाब: सर, मेरा नाम कार्तिक पाल है, पटियाला, पंजाब से हूँ। मेरी फर्म का नाम है “सनी इंजीनियरिंग वर्क्स”। पहले मैं गोबर से लकड़ी बनाने की मशीन (गोकास्ट मशीन) और गोबर डीवाटरिंग मशीन बनाता था, जो काफी फेमस हुई। मैंने देखा कि कोयले की खानें खत्म हो रही हैं और सरकार उस पर बैन लगा रही है। तो मैंने सोचा कि क्यों न एग्रीकल्चर वेस्ट से बायोफ्यूल तैयार किया जाए। यहाँ तक कि मैंने गोबर को भी बायो कोयला में कन्वर्ट किया है।
सवाल: ये बायो कोयला आम कोयले से कैसे बेहतर है?
जवाब: ये आम कोयले से ज्यादा देर तक जलता है। जलने का टाइम बढ़ जाता है। हमने इसमें बीच में होल दिया है। यह इंडिया की पहली ब्रिकेट है जो टॉरिफाइड है और स्मोकलेस है। बीच में होल होने से हवा पास होती है, फ्लेम मिलती है, वेस्ट ऐश कंटेंट कम होता है और यह पूरी तरह इको फ्रेंडली है। आज तक इंडिया में जितनी भी ब्रिकेट्स बनती हैं, वे स्मोक पैदा करती हैं क्योंकि उनमें होल नहीं होता और वो टॉरिफाइड नहीं होतीं।
दो साइज़, दो अलग-अलग इस्तेमाल
हमने इसके दो साइज़ बनाए हैं:
- 50 MM साइज़: यह यूनिवर्सल साइज़ है। बार्बेक्यू, होटल इंडस्ट्री में चलता है।
- 70 MM साइज़: यह बॉयलर्स के लिए है। इसे क्रश करके पेलेट्स भी बना सकते हैं।
छोटी मशीन, बड़ा कमाल
सवाल: अभी तक बाजार में ब्रिकेट बनाने वाली मशीनें 40-45 लाख रुपए की आती हैं। आपकी मशीन कितनी अलग है?
जवाब: बिल्कुल। मार्केट में जो मशीनें हैं, वो 40 लाख से ऊपर की हैं, बड़ा कनेक्शन चाहिए, बड़ी जगह चाहिए। मैंने एक मिनी मॉडल बनाया है। इसके लिए सिर्फ 40×40 का शेड चाहिए और 30 किलोवाट का कनेक्शन चाहिए। आम आदमी इसे आसानी से लगा सकता है।
सबसे बड़ी बात: इस मशीन में कोई फिक्स फ्यूल नहीं है। कोई भी ऑर्गेनिक वेस्ट हो—गेहूँ का भूसा, धान की पराली, लकड़ी का बुरादा, चावल का छिलका, गोबर—सबका प्रोसेस एक जैसा है। बस शर्त यह है कि माल का मॉइश्चर 5 से 8% होना चाहिए।
अगर माल में नमी ज्यादा होगी तो टॉरिफिकेशन नहीं होगी। मेरी मशीन में बनते वक्त स्टीम निकलती है, जो अंदर के वोलेटाइल मैटर को ड्राई करती है और माल को कड़क बनाती है। इसे कार्बोनाइजेशन या टॉरिफिकेशन कहते हैं। इससे जीसीबी बढ़ती है, राख कम बचती है और फ्यूल स्मोकलेस होता है।
मशीन का वॉकअराउंड और कैपेसिटी
- कैपेसिटी: 500 किलो प्रति घंटा (लकड़ी का पाउडर, धान की भूसी, गन्ने की मैली, पराली, गोबर सब)
- मोटर: 30 एचपी की क्रमटन या यावे की मोटर, ब्रांडेड
- हीटर: 5-5 किलोवाट के दो हीटर
- पैनल: स्टार्टिंग स्विच, इमरजेंसी स्टॉप, रिवर्स स्विच (माल अटके तो रिवर्स कर सकते हैं)
- टेंपरेचर कंट्रोलर: 300 से 400 डिग्री तक सेट कर सकते हैं, ऑटो कट सिस्टम
- पोर्टेबल: टायर लगे हैं, कहीं भी आसानी से ले जा सकते हैं
- कीमत: 45 लाख रुपए (बाजार में 40 लाख की मशीन से सस्ती और ज्यादा एडवांस)
- गारंटी: ऑनसाइड गारंटी, मोटर की गारंटी
छोटे मॉडल भी उपलब्ध:
- 15 HP मॉडल (खासकर गौशालाओं के लिए, गोबर प्रोसेस करने हेतु)
- 20 HP मॉडल
कितना प्रॉफिट? कितने दिन में पैसा वसूल?
सवाल: अगर कोई यह मशीन लेता है तो उसे कितने टाइम में पैसे वापस मिलेंगे?
जवाब: सर, 2 से 3 महीने मैक्सिमम। उदाहरण के लिए:
- चावल के छिलके का रेट: ₹3.80 प्रति किलो
- मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट: ₹1 प्रति किलो
- टोटल कॉस्ट: ₹4.80 प्रति किलो
- होलसेल बिक्री: ₹8 से ₹9 प्रति किलो
- एमआरपी (एंड कंज्यूमर): ₹12 से ₹14 प्रति किलो
यानी अगर आप ₹35-40 किलो वाले आम कोयले की जगह यह बायो कोयला इस्तेमाल करेंगे, तो आपको ₹12-14 किलो में स्मोकलेस, ज्यादा देर जलने वाला कोयला मिलेगा।
कौन-कौन सी इंडस्ट्रीज खरीद रही हैं?
- फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री
- केमिकल इंडस्ट्री
- फूड इंडस्ट्री
- टेक्सटाइल इंडस्ट्री
- बॉयलर प्लांट
- ईंट-भट्टे
सवाल: जिन 100 से ज्यादा लोगों ने यह मशीन ली है, वो कितना कमा रहे हैं?
जवाब: हर कस्टमर का अलग-अलग मटेरियल है। प्लाईवुड इंडस्ट्री वाला है, राइस शेलर वाला है। जो चावल के छिलके से बना रहा है, उसकी लागत ₹4.80 है और वो ₹8-9 में होलसेल बेच रहा है। डिमांड इतनी है कि जितना बनाओ, उतना बिक जाता है। यह फ्यूल मार्केट में पहली बार आया है, इसलिए कॉम्पिटीशन भी नहीं है।
आम आदमी के लिए गोल्डन ऑपर्च्युनिटी
सवाल: जिनके पास ज्यादा बजट नहीं है, वो क्या कर सकते हैं?
जवाब: हमारे पास 15 HP और 20 HP के छोटे मॉडल भी हैं। गांव-देहात में गोबर, पराली, सरसों का भूसा—बहुत सारा मटेरियल फ्री या बहुत सस्ते में मिल जाता है। अगर कोई युवा बेरोजगार है, तो वो इस बिजनेस में आ सकता है। शहर में हर जगह होलसेलर, मिडिलमैन मौजूद हैं जो आपका माल उठा लेंगे।
सलाह का कोई पैसा नहीं। आप आइए, पटियाला आकर मशीन देखिए। पूरा तसल्ली हो जाए, कॉन्फिडेंस आ जाए, तभी खरीदिए।
निष्कर्ष:
दोस्तों, यह मशीन सिर्फ एक इनोवेशन नहीं, बल्कि एक क्रांति है। पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण, गोबर की बर्बादी, लकड़ी का कटान—इन सबका सॉल्यूशन है कार्तिक पाल की बायो कोयला मशीन। कम लागत, ज्यादा प्रॉडक्शन, जबरदस्त डिमांड और 2 महीने में पैसा वसूल। अगर आप भी कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो इस आर्टिकल को शेयर कीजिए, किसी बेरोजगार युवा तक यह बात पहुँचाइए। हो सकता है, आपके एक शेयर से किसी की जिंदगी बदल जाए।
धन्यवाद! जय हिंद!